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Monday, March 6, 2017

आम गज़ल .....

आम गज़ल .....

आम हूँ बौरा रहा हूँ
पीर में मुस्का रहा हूँ ।

मैं नहीं दिखता बजट में
हर गज़ट पलटा रहा हूँ ।

फल रसीले बाँट कर बस
चोट को सहला रहा हूँ ।

गुठलियाँ किसने गिनी हैं
रस मधुर बरसा रहा हूँ ।

होम में जल कर, सभी की
कामना पहुँचा रहा हूँ ।

द्वार पर तोरण बना मैं
घर में खुशियाँ ला रहा हूँ ।

कौन पानी सींचता है
जी रहा खुद गा रहा हूँ ।

मीत उनको “कल” मुबारक
“आज” मैं जीता रहा हूँ ।

“खास” का अस्तित्व रखने
“आम” मैं कहला रहा हूँ ।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, March 5, 2017

जनकवि कोदूराम "दलित" : १०७ वीं जयंती पर विशेष


जनकवि कोदूराम “दलित” की साहित्य साधना :
( 5 मार्च को 107 वीं जयन्ती पर विशेष) : शकुन्तला शर्मा 

मनुष्य भगवान की अद्भुत रचना है, जो कर्म की तलवार और कोशिश की ढाल से, असंभव को संभव कर सकता है । मन और मति के साथ जब उद्यम जुड जाता है तब बड़े बड़े  तानाशाह को झुका देता है और लंगोटी वाले बापू गाँधी की हिम्मत को देख कर, फिरंगियों को हिन्दुस्तान छोड़ कर भागना पड़ता है । मनुष्य की सबसे बड़ी पूञ्जी है उसकी आज़ादी, जिसे वह प्राण देकर भी पाना चाहता है, तभी तो तुलसी ने कहा है - ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ।' तिलक ने कहा - ' स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे ।' सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - ' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ।' सम्पूर्ण देश में आन्दोलन हो रहा था, तो भला छत्तीसगढ़ स्थिर कैसे रहता ? छत्तीसगढ़ के भगतसिंह वीर नारायण सिंह को फिरंगियों ने सरेआम फाँसी पर लटका दिया और छत्तीसगढ़ ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' के निनाद से भर गया, ऐसे समय में ' वंदे मातरम् ' की अलख जगाने के लिए, कोदूराम 'दलित' जी आए और उनकी छंद - बद्ध रचना को सुनकर जनता मंत्र – मुग्ध हो गई  -

" अपन - देश आज़ाद  करे -  बर, चलो  जेल - सँगवारी
 कतको झिन मन चल देइन, आइस अब - हम रो- बारी।
जिहाँ लिहिस अवतार कृष्ण हर,भगत मनन ला तारिस
दुष्ट- जनन ला मारिस अउ,   भुइयाँ के भार - उतारिस।
उही  किसम जुर - मिल के हम, गोरा - मन ला खेदारी
अपन - देश आज़ाद  करे  बर चलो - जेल - सँगवारी।"

15 अगस्त सन् 1947 को हमें आज़ादी मिल गई, तो गाँधी जी की अगुवाई में दलित जी ने जन - जागरण को संदेश दिया –

" झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग
सत अउर अहिंसा सफल रहिस, हिंसा के मुँह मा लगिस आग ।
जुट - मातृ - भूमि के सेवा मा, खा - चटनी बासी - बरी - साग
झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग ।
उज्जर हे तोर- भविष्य - मीत,फटकार - ददरिया सुवा - राग
झन सुत सँगवारी जाग - जाग अब तोर देश के खुलिस भाग ।"

हमारे देश की पूँजी को लूट कर, लुटेरे फिरंगी ले गए, अब देश को सबल बनाना ज़रूरी था, तब दलित ने जन -जन से, देश की रक्षा के लिए, धन इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया –

कवित्त –

" देने का समय आया, देओ दिल खोल कर, बंधुओं बनो उदार बदला ज़माना है
देने में ही भला है हमारा औ’ तुम्हारा अब, नहीं देना याने नई आफत बुलाना है।
देश की सुरक्षा हेतु स्वर्ण दे के आज हमें, नए- नए कई अस्त्र- शस्त्र मँगवाना है
समय को परखो औ’ बनो भामाशाह अब, दाम नहीं अरे सिर्फ़ नाम रह जाना है।"

छत्तीसगढ़ के ठेठ देहाती कवि कोदूराम दलित ने विविध छंदों में छत्तीसगढ़ की महिमा गाई है। भाव - भाषा और छंद का सामञ्जस्य देखिए –

चौपाई छंद

"बन्दौं छत्तीसगढ़ शुचिधामा, परम - मनोहर सुखद ललामा
जहाँ सिहावादिक गिरिमाला, महानदी जहँ बहति विशाला।
जहँ तीरथ राजिम अति पावन, शबरीनारायण मन भावन
अति - उर्वरा - भूमि जहँ केरी, लौहादिक जहँ खान घनेरी ।"

कुण्डलिया छन्द -

" छत्तीसगढ़ पैदा - करय अड़बड़ चाँउर - दार
हवयँ इहाँ के लोग मन, सिधवा अऊ उदार ।
सिधवा अऊ उदार हवयँ दिन रात कमावयँ
दे - दूसर ला मान, अपन मन बासी खावयँ ।
ठगथें ए बपुरा- मन ला बंचक मन अड़बड़
पिछड़े हावय अतेक इही कारण छत्तीसगढ़ ।"

सार  छंद -

" छन्नर छन्नर चूरी बाजय खन्नर खन्नर पइरी
हाँसत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलहिन टूरी ।
काट काट के धान - मढ़ावय ओरी - ओरी करपा
देखब मा बड़ निक लागय सुंदर चरपा के चरपा ।
लकर धकर बपरी लइकोरी समधिन के घर जावै
चुकुर - चुकुर नान्हें बाबू ला दुदू पिया के आवय।
दीदी - लूवय धान खबा-खब भाँटो बाँधय - भारा
अउहाँ झउहाँ बोहि - बोहि के भौजी लेगय ब्यारा।"

खेती का काम बहुत श्रम - साध्य होता है, किंतु दलित जी की कलम का क़माल है कि वे इस दृश्य का वर्णन, त्यौहार की तरह कर रहे हैं। इन आठ पंक्तियों से सुसज्जित सार छंद में बारह दृश्य हैं, मुझे ऐसा लगता है कि दलित जी की क़लम में एक तरफ निब है और दूसरी ओर तूलिका है, तभी तो उनकी क़लम से लगातार शब्द - चित्र बनते रहते है और पाठक भाव - विभोर हो जाता है, मुग्ध हो जाता है ।

निराला की तरह दलित भी प्रगतिवादी कवि हैं । वे समाज की विषमता को देखकर हैरान हैं, परेशान हैं और सोच रहें हैं कि हम सब, एक दूसरे के सुख - दुःख को बाँट लें तो विषमता मिट जाए –

मानव की -

" जल पवन अगिन जल के समान यह धरती है सब मानव की
हैं  किन्तु कई - धरनी - विहींन यह करनी है सब - मानव की ।
कर - सफल - यज्ञ  भू - दान विषमता हरनी है सब मानव की
अविलम्ब - आपदायें - निश्चित ही हरनी - है सब- मानव की ।"

श्रम का सूरज (कवित्त)

" जाग रे भगीरथ - किसान धरती के लाल, आज तुझे ऋण मातृभूमि का चुकाना है
आराम - हराम वाले मंत्र को न भूल तुझे, आज़ादी की - गंगा घर - घर पहुँचाना है ।
सहकारिता से काम करने का वक्त आया, क़दम - मिला के अब चलना - चलाना है
मिल - जुल कर उत्पादन बढ़ाना है औ’, एक - एक दाना बाँट - बाँट - कर खाना है ।"

सवैया -

" भूखों - मरै उत्पन्न करै जो अनाज पसीना - बहा करके
बे - घर हैं  महलों को बनावैं जो धूप में लोहू - सुखा करके ।
पा रहे कष्ट स्वराज - लिया जिनने तकलीफ उठा - करके
हैं कुछ चराट चलाक उड़ा रहे मौज स्वराज्य को पा करके ।"

गरीबी की आँच को क़रीब से अनुभव करने वाला एक सहृदय कवि ही इस तरह, गरीबी को अपने साथ रखने की बात कर रहा है । आशय यह है कि - " गरीबी ! तुम यहाँ से नहीं जाओगी, जो हमारा शोषण कर रहे हैं, वे तुम्हें यहाँ से जाने नहीं देंगे और जो भूखे हैं वे भूखे ही रहेंगे ।" जब कवि समझ जाता है कि हालात् सुधर नहीं सकते तो कवि चुप हो जाता है और उसकी क़लम उसके मन की बात को चिल्ला - चिल्ला कर कहती है -

 गरीबी 

" सारे गरीब नंगे - रह कर दुख पाते हों तो पाने दे
दाने दाने के लिए तरस मर जाते हों मर जाने दे ।
यदि मरे - जिए कोई तो इसमें तेरी गलती - क्या
गरीबी तू न यहाँ से जा ।"

कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि गाय जो हमारे जीवन की सेतु है, जो ' अवध्या' है, उसी की हत्या होगी और सम्पूर्ण गो - वंश का अस्तित्व ही खतरे में पड जाएगा । दलित जी ने गो - माता की महिमा गाई है । बैलों की वज़ह से हमें अन्न - धान मिल जाता है और गो -रस की मिठास तो अमृत -तुल्य होती है। दलित जी ने समाज को यह बात बताई है कि-"गो-वर को केवल खाद ही बनाओ,उसे छेना बना कर अप-व्यय मत करो" -

 गो - वध बंद करो

" गो - वध बंद करो जल्दी अब, गो - वध बंद करो
भाई इस - स्वतंत्र - भारत में, गो - वध बंद करो ।
महा - पुरुष उस बाल कृष्ण का याद करो तुम गोचारण
नाम पड़ा गोपाल कृष्ण का याद करो तुम किस कारण ?
माखन- चोर उसे कहते हो याद करो तुम किस कारण
जग सिरमौर उसे कहते हो, याद करो तुम किस कारण ?
मान रहे हो देव - तुल्य उससे तो तनिक-- डरो ॥

समझाया ऋषि - दयानंद ने, गो - वध भारी पातक है
समझाया बापू ने गो - वध राम राज्य का घातक है ।
सब  - जीवों को स्वतंत्रता से जीने - का पूरा - हक़ है
नर पिशाच अब उनकी निर्मम हत्या करते नाहक हैं।
सत्य अहिंसा का अब तो जन - जन में भाव - भरो ॥

जिस - माता के बैलों- द्वारा अन्न - वस्त्र तुम पाते हो
जिसके दही- दूध मक्खन से बलशाली बन जाते हो ।
जिसके बल पर रंगरलियाँ करते हो मौज - उड़ाते हो
अरे उसी - माता के गर्दन- पर तुम छुरी - चलाते हो।
गो - हत्यारों चुल्लू - भर - पानी में  डूब - मरो
गो -रक्षा गो - सेवा कर भारत का कष्ट - हरो ॥"

शिक्षक की नज़र पैनी होती है । वह समाज के हर वर्ग के लिए सञ्जीवनी दे - कर जाता है । दलित जी ने बाल - साहित्य की रचना की है, बच्चे ही तो भारत के भविष्य हैं -

वीर बालक

"उठ जाग हिन्द के बाल - वीर तेरा भविष्य उज्ज्वल है रे ।
मत हो अधीर बन कर्मवीर उठ जाग हिन्द के बाल - वीर।"

अच्छा बालक पढ़ - लिख कर बन जाता है विद्वान
अच्छा बालक सदा - बड़ों का करता  है सम्मान ।
अच्छा बालक रोज़ - अखाड़ा जा - कर बनता शेर
अच्छा बालक मचने - देता कभी नहीं - अन्धेर ।
अच्छा बालक ही बनता है राम लखन या श्याम
अच्छा बालक रख जाता है अमर विश्व में नाम ।"

अब मैं अपनी रचना की इति की ओर जा रही हूँ, पर दलित जी की रचनायें मुझे नेति - नेति कहकर रोक रही हैं । दलित जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । समरस साहित्यकार, प्रखर पत्रकार, सजग प्रहरी, विवेकी वक्ता, गंभीर गुरु, वरेण्य विज्ञानी, चतुर चित्रकार और कुशल किसान ये सभी उनके व्यक्तित्व में विद्यमान हैं, जिसे काल का प्रवाह कभी धूमिल नहीं कर सकता ।


हरि ठाकुर जी के शब्दों में -

" दलित जी ने सन् -1926 से लिखना आरम्भ किया उन्होंने लगभग 800 कवितायें लिखीं,जिनमें कुछ कवितायें तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और कुछ कविताओं का  प्रसारण आकाशवाणी से हुआ । आज छत्तीसगढ़ी में लिखने वाले निष्ठावान साहित्यकारों की पूरी पीढ़ी सामने आ चुकी है किंतु इस वट - वृक्ष को अपने लहू - पसीने से सींचने वाले, खाद बन कर, उनकी जड़ों में मिल जाने वाले साहित्यकारों को हम न भूलें।"

साहित्य का सृजन, उस परम की प्राप्ति के पूर्व का सोपान है । जब वह अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है तो अपना परिचय कुछ इस तरह देता है, और यहीं पर उसकी साधना सम्पन्न होती है -

आत्म परिचय - 

" मुझमें - तुझमें सब ही में रमा वह राम हूँ- मैं जगदात्मा हूँ
सबको उपजाता हूँ पालता- हूँ करता सबका फिर खात्मा हूँ।
कोई मुझको दलित भले ही कहे पर वास्तव में परमात्मा हूँ
तुम ढूँढो मुझे मन मंदिर में मैं मिलूँगा तुम्हारी ही आत्मा हूँ।"

शकुन्तला शर्मा, भिलाई                                                    
मो. 
9302830030                                                           

Wednesday, November 16, 2016

किस करवट है बैठता, देखें अब के ऊँट

*दोहा छन्द*`

निर्णय के परिणाम से, हर कोई है स्तब्ध
सहनशीलता सर्वदा, जनता का प्रारब्ध ।

जनता ने पी ही लिया, फिर से कड़ुवा घूँट
किस करवट है बैठता, देखें अब के ऊँट ।

दूषित नीयत से अरुण, पनपा भ्रष्टाचार
आशान्वित होकर सदा, जनता बनी कतार ।

आकर कर दो राम जी, दुराचार को नष्ट
राम राज की आस में, जनता सहती कष्ट ।

विस्फारित आँखें लिए, ताक रहा आतंक
हर कोई जनता बना, क्या राजा क्या रंक ।

अरुण कुमार निगम

Sunday, November 13, 2016

सही फैसला या गलत, बतलायेगा वक्त.....

कुछ सामयिक दोहे .....

मैला है यदि आचरण, नीयत में है खोट 
रावण मिट सकते नहीं, चाहे बदलो नोट ।
 
नैतिक शिक्षा लुप्त है, सब धन पर आसक्त 
सही फैसला या गलत, बतलायेगा वक्त । 

बचपन बस्ते में दबा, यौवन काँधे भार 
प्रौढ़ दबा दायित्व में, वृद्ध हुए लाचार । 

पद का मद सँभला नहीं, कद पर धन की छाँव 
चौसर होती जिंदगी, नए नए नित दाँव । 

दिशा दशा को देख के, कवि-मन चुभते तीर 
अंधा बाँटे रेवड़ी, गदहा खाये खीर । 


अरुण कुमार निगम

Saturday, November 12, 2016

समाचार आया नए नोट का....



एक सामयिक ग़ज़ल.....
(१२२ १२२ १२२ १२)
समाचार आया नए नोट का
गिरा भाव अंजीर-अखरोट का |

दवा हो गई बंद जिस रात से
हुआ इल्म फौरन उन्हें चोट का |

मुखौटों में नीयत नहीं छुप सकी
सभी को पता चल गया खोट का |

जमानत के लाले उन्हें पड़ गए
भरोसा सदा था जिन्हें वोट का |

नवम्बर महीना बना जनवरी
उड़ा रंग नायाब-से कोट का |

मकां काँच के हो गए हैं अरुण
नहीं आसरा रह गया ओट का |


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
(छत्तीसगढ़)

Friday, November 11, 2016

आज के सन्दर्भ में दोहे -

आज के सन्दर्भ में दोहे -

भैया देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि
छुट्टा आवै काम उत,का करि सकै हजारि ।

उनको आवत देख के, छुट्टन करै पुकारि
नोट हजारि बंद हुए, कल अपनी भी बारि ।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे नोट हजार
मार्किट में चलता नहीं, गायब ब्लैक बजार ।

भैया खड़ा बजार में, लिए हजारी हाथ
कोई भी पूछै नहीं, मानो हुआ अनाथ ।

अरुण कुमार निगम

Wednesday, September 7, 2016

मन से उपजे गीत (मधुशाला छंद)

मन से उपजे गीत (मधुशाला छंद)

ह्रदय प्राण मन और शब्द-लय , एक ताल में जब आते 
तब ही बनते छंद सुहाने, जो सबका मन हर्षाते 
तुकबंदी है टूटी टहनी, पुष्प खिला क्या पाएगी 
मन से उपजे गीत-छंद  ही, सबका मन हैं छू पाते ||


अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़